छत्तीसगढ़सारंगढ़-बिलाईगढ़

मनरेगा में पसीना बहाकर कर्जदार हुए सरपंच..

उधारी और कर्ज के दलदल में धंसे जनप्रतिनिधि..

डबल इंजन के दावों पर सुलगते सवाल..

सारंगढ़ : ग्रामीण विकास के तमाम दावों और नारों की कलई खोलती यह वह कड़वी हकीकत है, जहां व्यवस्था ने जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को ही भिखारी बनाकर छोड़ दिया है। मनरेगा के तहत गांवों में पक्के निर्माण पूरे हुए 8 महीने बीत चुके हैं, लेकिन सामग्री भुगतान के नाम पर शासन-प्रशासन के हाथ खाली हैं। जिन सरपंचों ने अपने गांव की सूरत बदलने के लिए बाजार से उधार उठाया और अपनी पत्नियों के जेवर तक गिरवी रख दिए, आज वे ही पाई-पाई के लिए दफ्तरों की चौखट पर गिड़गिड़ाने को मजबूर हैं।

जिले के ग्रामीण क्षेत्रों मे सिंचाई नालियां बन गईं, चेक डैम और स्टॉप डैम खड़े हो गए। अधिकारियों ने फाइलों पर दस्तखत कर वाहवाही लूट ली, लेकिन जब गिट्टी, सीमेंट, सरिया और रेत का बिल चुकाने की बारी आई, तो पूरी व्यवस्था को लकवा मार गया। 5 से 8 महीने का लंबा वक्त गुजर जाने के बावजूद मनरेगा के मद में एक ढेला तक नहीं आया है। सवाल यह है कि क्या सरकारी तंत्र यह मानकर बैठा है कि दुकानदार सामग्री मुफ्त में बांटते हैं?

सरपंचों के गले में उधारी का फंदा-

गांव में काम न रुके और विकास की गति न थमे, इस भरोसे के साथ सरपंचों ने व्यापारियों से उधारी में सामान उठाया। कई जनप्रतिनिधियों ने अपनी निजी पूंजी दांव पर लगा दी, तो कइयों ने घर के गहने गिरवी रखकर काम पूरा कराया। आज स्थिति यह है कि सप्लायर और दुकानदार सरपंचों के घर पर तगादा कर रहे हैं, उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा तार-तार हो रही है, लेकिन मंत्रालय से लेकर जनपद तक बैठे हुक्मरानों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही।

जब केंद्र और राज्य दोनों ही स्तरों पर एक ही विचार की सरकार काबिज है, तो फिर ग्रामीण विकास की रीढ़ माने जाने वाले मनरेगा का यह हश्र क्यों? क्या सरकार की मंशा सिर्फ कागजों पर आंकड़े चमकाने की है? यदि चुने हुए जन प्रतिनिधियों का यह हाल है, तो उस गरीब मजदूर की लाचारी का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।

ग्रामीण जनप्रतिनिधियों ने दो-टूक चेतावनी दी है कि यदि महीनों से अटके इस बकाये का तुरंत निपटारा नहीं हुआ, तो गांव-गांव में व्यवस्था के खिलाफ आक्रोश फूटना तय है। विकास की बलि चढ़ाकर और जनप्रतिनिधियों को बंधक बनाकर कोई भी सरकार ज्यादा दिन तक ‘सुशासन’ का ढोल नहीं पीट सकती।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button