बाल कृष्ण की चंचलता से दुर्गा ताण्डव तक, दीक्षा रथ ने चक्रधर समारोह में बांधा समां

सारंगढ़। 41वें अंतरराष्ट्रीय चक्रधर समारोह की सांस्कृतिक संध्या में सारंगढ़ की युवा ओडिसी नृत्यांगना दीक्षा रथ ने अपनी दो प्रभावशाली प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके नृत्य में भक्ति, भाव, शक्ति और भारतीय संस्कृति के अद्भुत संगम ने मंच को जीवंत कर दिया।
दीक्षा रथ ने पहली प्रस्तुति में श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं को ओडिसी नृत्य के माध्यम से साकार किया। बाल कृष्ण की चंचलता, नटखट अदाएं, यशोदा की ममता और कृष्ण के बाल स्वरूप को उनकी भावपूर्ण मुद्राओं एवं अभिनय ने ऐसा जीवंत किया कि दर्शक भाव-विभोर हो उठे।
इसके बाद प्रस्तुत ‘दुर्गा ताण्डव’ ने मंच का वातावरण पूरी तरह शक्ति और ऊर्जा से भर दिया। माँ दुर्गा के विविध स्वरूपों, शौर्य, करुणा और शक्ति को दीक्षा ने ओडिसी की सशक्त भाव-भंगिमाओं एवं नृत्य मुद्राओं के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। प्रस्तुति के दौरान सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
दीक्षा रथ पिछले लगभग 10 वर्षों से ओडिसी नृत्य की साधना कर रही हैं। उन्होंने प्रसिद्ध नृत्याचार्य गुरु गजेंद्र कुमार पंडा के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण प्राप्त किया है तथा भुवनेश्वर से भी ओडिसी नृत्य की विधिवत शिक्षा ली है। वे छत्तीसगढ़ शासन की पंजीकृत कलाकार हैं और कोणार्क महोत्सव, खजुराहो महोत्सव सहित अनेक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी कला प्रस्तुत कर चुकी हैं।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी दीक्षा रथ ने अपनी प्रतिभा का परचम लहराया है। दुबई में प्रथम तथा सिंगापुर में द्वितीय पुरस्कार प्राप्त कर उन्होंने अपनी कला-साधना की उपलब्धियों में एक और गौरवपूर्ण अध्याय जोड़ा है।
बाल कृष्ण की निश्छल चंचलता से लेकर माँ दुर्गा के विराट शक्ति स्वरूप तक की दीक्षा रथ की यह नृत्ययात्रा दर्शकों के लिए केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भक्ति, संस्कृति, नारी शक्ति और भारतीय कला-परंपरा का भावपूर्ण अनुभव बन गई।



