छत्तीसगढ़सारंगढ़-बिलाईगढ़

सारंगढ़ अपर सत्र न्यायालय का बड़ा फैसला: 54 हजार के चेक बाउंस पर बसन्ती भास्कर को 1 लाख का जुर्माना, अदायगी न करने पर 6 माह की सजा*

*सारंगढ़,
जिला एवं सत्र न्यायालय सारंगढ़-बिलाईगढ़ ने चेक अनादरण (धारा 138 परक्राम्य लिखत अधिनियम) के एक चर्चित मामले में अहम फैसला सुनाया है। प्रथमअपर सत्र न्यायाधीशश्री संतोष महोबिया द्वारा * दाण्डिक अपील प्रकरण चंद्रा कम्युनिकेशन विरुद्ध बसंती भास्कर में आरोपी को दोषी ठहराते हुए *1,00,000/- रुपये (एक लाख)* के अर्थदंड से दंडित किया गया है।

*मामले का पूरा घटनाक्रम:*

न्यायालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, परिवादी राजकुमार चंद्रा, जो चंद्रा कम्युनिकेशन्स, सारंगढ़ के प्रोपराइटर हैं, ने अपने परिवाद में बताया था कि अभियुक्ता बसंती भास्कर ने दिनांक 31.07.2018 को उनकी दुकान से 74,000/- रुपये का कंप्यूटर एवं संबंधित सामग्री क्रय की थी।

उस समय अभियुक्ता ने 20,000/- रुपये नगद भुगतान किया और शेष *54,000/- रुपये* के लिए अपने खाते का चेक क्रमांक 00431 दिनांक 31.01.2019 को दिया। परिवादी द्वारा उक्त चेक को दिनांक 04.02.2019 को भारतीय स्टेट बैंक सारंगढ़ के माध्यम से इंडियन बैंक शाखा पेंड्रावन में समाशोधन हेतु लगाया गया, परंतु खाते में पर्याप्त राशि न होने के कारण चेक अनादरित होकर वापस आ गया।

इसके बाद परिवादी ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से दिनांक 07.03.2019 को विधिक नोटिस प्रेषित कर 15 दिवस के भीतर राशि अदा करने को कहा, परंतु अभियुक्ता द्वारा न तो नोटिस का जवाब दिया गया और न ही राशि का भुगतान किया गया। अंततः परिवादी को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।

*न्यायालय में चली लंबी बहस:*

विचारण के दौरान अभियुक्ता पक्ष द्वारा यह तर्क दिया गया कि परिवादी राजकुमार चंद्रा उक्त दुकान के संचालक ही नहीं हैं और उनके पास कोई अधिकार पत्र नहीं है।

वहीं परिवादी पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता ने तर्क दिया कि परिवादी ने अपने शपथ पत्र में स्वयं को प्रोपराइटर बताया है और प्रतिपरीक्षण के दौरान भी इस तथ्य को दृढ़ता से रखा है। साथ ही अभियुक्ता ने धारा 313 दं.प्र.सं. के कथन में यह स्पष्ट नहीं किया कि आखिर उसने प्रश्नाधीन चेक किस एवज में दिया था।

*न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणी:*

माननीय न्यायालय ने अपने आदेश के पैरा 16 एवं 17 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि जब अभियुक्त द्वारा चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार किया गया है, तो यह विधिक धारणा (Legal Presumption) बनती है कि चेक वैध दायित्व या ऋण के उन्मोचन के लिए ही दिया गया है। इस धारणा का खंडन करने का भार अभियुक्त पर था, जिसमें वह पूर्णतः असफल रही। अभियुक्त द्वारा खंडन हेतु कोई विश्वसनीय साक्ष्य अथवा दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया।

इस आधार पर न्यायालय ने विचारण न्यायालय द्वारा पारित दोषमुक्तिके फैसले को बदला और अर्थदण्ड की राशि को 1 लाख रुपये अर्थदण्ड कर दिया।

*फैसले का आदेश (पैरा 22):*

1. अभियुक्ता बसंती भास्कर को धारा 138 N.I. Act के तहत 1,00,000/- रुपये के अर्थदण्ड से दंडित किया जाता है।
2. अभियुक्ता को आदेशित किया जाता है कि वह फैसले की तिथि से *45 दिवस के भीतर* उक्त राशि विचारण न्यायालय में जमा करे।
3. राशि जमा न करने की स्थिति में उसे *6 माह का सादा कारावास* भुगतना होगा।
4. जुर्माने की राशि जमा होने पर 100000 एक लाख रुपये प्रतिकर* के रूप में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 395(1)(ख) (पूर्व धारा 357(1)(ख) दं.प्र.सं.) के अंतर्गत परिवादी चन्द्रा कंप्यूटर के प्रोपाइटर राजकुमार चंद्रा को प्रदान की जाएगी।परिवादी की ओर से पैरवी अधिवक्ता विजयकुमार तिवारी,दीपक तिवारी,देवप्रसाद कहा र देवेंद्र नाथ नन्दे,राजेश बरेठ, कमल तिवारी ने की

इस फैसले के बाद व्यापारी वर्ग में हर्ष है। व्यापारी संगठनों ने कहा है कि इस प्रकार के कठोर फैसलों से उधारी लेकर चेक बाउंस करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगेगा।

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