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*सबसे बड़ा चमत्कार है व्यक्ति का आंतरिक परिवर्तन – ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी*

*सारंगढ़ में ‘गीता ज्ञान शिविर’ के छठवें दिन राजयोग, श्रेष्ठ कर्म और अभ्यास की महत्ता पर विस्तृत प्रवचन*

**सारंगढ़, 03 दिसम्बर 2025* :- ब्रह्माकुमारीज़ फुलझरियापारा, सारंगढ़ की ओर से आयोजित *“गीता की राह – वाह जिंदगी, वाह”* शिविर के छठवें दिन का सत्र अत्यंत प्रेरणादायी एवं ज्ञानवर्धक रहा। बिलासपुर से पधारीं *राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी* ने श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम छह अध्यायों के सार तथा आगामी अध्यायों की भूमिका पर गहन प्रकाश डाला।

*आध्यात्मिक चार्जिंग की आवश्यकता*
दीदी जी ने कहा कि जीवन में सफलता और आंतरिक शक्ति का आधार है— *अभ्यास*। जैसे मोबाइल फोन को प्रतिदिन चार्ज करना आवश्यक है, उसी प्रकार आत्मा को भी रोजाना आध्यात्मिक चार्जिंग की आवश्यकता होती है।
उन्होंने बताया कि प्रातःकाल का समय— *4:00 बजे से 7:00 बजे तक* —मन को शांत, शक्तिशाली और एकाग्र बनाने के लिए अत्यंत वरदानी है। सेवा केंद्रों में प्रतिदिन सामूहिक राजयोग का अभ्यास कराया जाता है, जो मन को उन्नत बनाता है।

*श्रेष्ठ कर्म ही श्रेष्ठ भाग्य का आधार*
दीदी ने कहा कि परमात्मा ने प्रत्येक मनुष्य के हाथ में *भाग्य की कलम* दे रखी है। श्रेष्ठ संकल्प, श्रेष्ठ वाणी और श्रेष्ठ कर्म— ये ही व्यक्ति का श्रेष्ठ भविष्य रचते हैं।
उन्होंने कहा कि जीवन में **कंट्रोलिंग पावर** और **रूलिंग पावर** विकसित करना आवश्यक है ताकि किसी के नकारात्मक व्यवहार के प्रभाव में आकर हम अपना स्तर न गिराएँ, बल्कि हर परिस्थिति में अपना श्रेष्ठ स्वरूप बनाए रखें।

*गृहस्थ जीवन में भी संभव है आध्यात्मिक उत्कृष्टता*
मंजू दीदी ने स्पष्ट किया कि गीता का पूरा ज्ञान गृहस्थों के लिए ही है। घर-परिवार में रहते हुए भी उच्च आत्मिक उपलब्धियाँ संभव हैं—यदि व्यक्ति सतत अभ्यास, संयम और सकारात्मकता अपनाए।

*परमात्मा का स्वरूप और भक्ति योग की भूमिका*

शिविर के छठवें दिन भक्ति योग की प्रस्तावना दी गई। दीदी जी ने बताया कि परमात्मा *सृष्टि के मूल और बीज* हैं; वे ज्योति-स्वरूप, अजन्मा और अविनाशी हैं।
चार प्रकार के भक्त— *आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी* का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ज्ञान सहित भक्ति करने वाले ज्ञानी भक्त परमात्मा को अत्यंत प्रिय हैं और वे परमात्मा की ही याद में रहते हैं।

*परिवर्तन ही सबसे बड़ा चमत्कार*
दीदी जी ने कहा कि सच्चा चमत्कार किसी बाहरी वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि *आंतरिक परिवर्तन* है। सकारात्मक विचारों से इच्छा-शक्ति विकसित होती है, और यही जीवन को उन्नत बनाती है।
उन्होंने कहा—
*“राजयोग सभी योगों का राजा है, क्योंकि इसमें ज्ञान, कर्म और भक्ति—सभी मार्ग समाहित हैं।”*

*निंदा में भी सीख और शक्ति*
निंदा के विषय में उन्होंने हंसमुख शैली में कहा— *“निंदा उसी की होती है जो जिंदा होता है; प्रशंसा तो हमेशा मरे हुए की होती है।”*
इसलिए आलोचना से दुखी न होकर, उसे आत्म-विकास का अवसर समझना चाहिए।
जीवन में क्या पकड़े रखना है और क्या छोड़ देना है—इस समझ को भी आत्मिक शांति का मूल बताया गया।

*शिविर आगे अंतिम षटक की ओर*
सेवाकेंद्र प्रभारी ब्र.कु. कंचन दीदी ने जानकारी दी कि प्रवचन श्रृंखला अब गीता के अगले छह अध्यायों और तत्पश्चात अंतिम षटक की ओर है। अंतिम सत्र के पश्चात सात दिवसीय राजयोग का निःशुल्क बेसिक कोर्स संचालित होगा जिसमें सभी शहरवासी शामिल होकर मेडिटेशन सीख सकते हैं।

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