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गोपाल जी मंदिर छोटेमठ में भागवत का शुभारंभ

सारंगढ़ । गोपाल जी मंदिर छोटे मठ के महंत बंशीधर दास मिश्रा द्वारा व्यास पीठ पर बैठ भागवत कथा का श्री गणेश कियें । भागवताचार्य ने कहा कि भागवत भगवान क्या है ? भागवत भगवान से तात्पर्य है भगवान श्रीकृष्ण का वह स्वरूप जो भागवत कथा में प्रकट होता है वहीं भागवत शब्द भगवान से ही निकला है, जिसका अर्थ है – भगवान से संबंधित, भगवान की कथा , भगवान का स्वरूप जब कोई व्यक्ति श्रद्धा से भागवत कथा सुनता है या उसका पाठ करता है , तो स्वयं भगवान उसमें प्रकट हो कर भक्तों को दर्शन व मोक्ष प्रदान करते हैं। इसलिए कहा गया है । श्रवणं भागवतात् पुण्यं नराणां शुद्धिहेतवः। अर्थात् – भागवत कथा का श्रवण मनुष्य के पापों का नाश करता है और आत्मा को शुद्ध करता है । आचार्य द्वारा श्रीमद्भागवत के एक – एक अक्षरों का अलग-अलग अर्थ बताते हुए कहे कि – क्षितिज , जल , पावक , गगन , समीरा पंचतत्व रचित अधम शरीरा । यें तत्व ही भागवत है ।

कथाविन्यास को आगे बढ़ाते हुए भागवताचार्य मिश्रा द्वारा धुंधकारी की कथा अत्यंत प्रेरणादायक और ज्ञानवर्धक है। यह कथा श्रीमद्भागवत के गोकर्ण – धुंधकारी प्रसंग में आती है। एक ब्राह्मण थे आत्मदेव, उनकी पत्नी थीं धुंधुली । आत्मदेव को संतान की इच्छा थी । लेकिन पत्नी ने छल से एक राक्षसी के गर्भ से उत्पन्न धुंधकारी , बालक को अपना बताया । बड़ा हो कर धुंधकारी दुष्ट, दुष्कर्मी, पापी, व्यभिचारी बन गया । वह पंच वेश्याओं के साथ रहता था, चोरी करता था व हिंसा करता था । आखिर एक दिन उन्हीं वेश्याओं ने उसकी हत्या कर दी और वह भूत बन गया । मरने के बाद उसकी आत्मा भटकने लगी, क्योंकि उसके खाते में कोई पुण्य कर्म नहीं था । व्यास पीठ से भागवताचार्य के द्वारा जीव, ब्रह्म , आत्मा , माया, भक्ति , पाप और पुण्य को भी अभिव्यक्त करते हुए कहा कि – माया मुई ना मन मुवा , मरी मरी गया शरीर आशा , तृषा ना मुई कह गए दास कबीर ।

कथा को आगे बढ़ाते हुए महंत बंशीधर ने कहा कि – गोकर्ण, धुंधकारी का सौतेला भाई था अत्यंत धर्मनिष्ठ और ज्ञानी ब्राह्मण । जब उसे पता चला कि – भाई धुंधकारी भूत रूप में दुःख पा रहा है, तो उसने उसे मोक्ष दिलाने का उपाय ढूंढा । गोकर्ण ने सात दिन तक श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण किया। पहले दिन कथा शुरू होते ही धुंधकारी की भूत आत्मा एक बाँस के छिद्रों में जाकर बैठी । वह सात छिद्रों वाला बाँस था जो जन्मों के पापों का प्रतीक था । जो उसके सात जैसे जैसे कथा आगे बढ़ी, हर दिन एक छिद्र फट गया और सातवें दिन, कथा समाप्त होते ही धुंधकारी को दिव्य देह प्राप्त हुई और वह आकाश मार्ग से बैकुंठ चला गया और सातवें दिन कथा समाप्त होते है । धुंधकारी को दिव्य देह प्राप्त हुई और वह आकाश मार्ग से बैकुंठ चला गया। तब देवता ने आकाशवाणी की कि – जो श्रद्धा से श्रीमद्भागवत कथा को सुनता या करवाता है ,वह भी धुंधकारी की तरह पवित्र होकर भगवान के धाम को प्राप्त करता है । जिसका सार धुंधकारी अंधकार में पड़ा हुआ जीव (भटकती आत्मा) गोकर्ण ज्ञान और भक्ति का प्रतीक , भागवत कथा वह प्रकाश जो अंधकार , पाप व मोह को मिटाकर आत्मा को मुक्ति देता है ।

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