अंधेरे कमरे में जलती लालटेन और शतरंज का जुनून लखनऊ में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करने तक की यात्रा

सारंगढ़ — बचपन में कौवाताल गाँव के सरकारी स्कूल की गलियाँ, बार-बार आती-जाती बिजली और उन हालातों के बीच पनपा शतरंज का जुनून… आज सब कुछ बहुत याद आ रहा है।
आज भी याद है, जब गाँव के दस साल के बच्चे दुर्गा प्रसाद तिवारी अपने दादाजी और गाँव के बड़े-बुज़ुर्गों की ‘आंठ’ (बैठक) में चुपचाप बैठा रहता था। दरी पर बिछी शतरंज की बिसात, वज़ीर-घोड़े की चालें और बुज़ुर्गों की गंभीर चर्चाएँ—वह घंटों बस उन्हें खेलते हुए देखता रहता था। बिना किसी प्रशिक्षण के, सिर्फ़ देखकर ही उसने खेल की बारीकियाँ सीखीं।
गाँव में बिजली की भारी समस्या थी। कई-कई रातें लालटेन की मद्धम रोशनी में दोस्तों और परिवार के साथ शतरंज खेलते बीत जाती थीं। न कोई कोचिंग, न स्टेट लेवल टूर्नामेंट, न संसाधन—बस एक जुनून था, जो अंधेरे कमरे में जलती लालटेन की तरह ज़िंदा था।
आज जब वही बच्चा राष्ट्रीय विद्युत मंडल कर्मचारी डिपार्टमेंटल शतरंज टूर्नामेंट में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व कर रहा है, और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में खेल रहा है, तो उसका पूरा संघर्ष किसी फिल्म की तरह आँखों के सामने घूम जाता है।
उनका कहना है—
“मैच छोटा हो या बड़ा, लेकिन एक ग्रामीण पृष्ठभूमि से आकर यहाँ तक पहुँचना मेरे लिए बहुत मायने रखता है।”
अपने आख़िरी फाइनल गेम के दौरान उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि हार हो या जीत, ये भावनाएँ सबके साथ ज़रूर साझा करेंगे।
आज दुर्गा तिवारी छत्तीसगढ़ विद्युत मंडल में इंजीनियर के रूप में शक्ति ज़िला मुख्यालय में पदस्थ हैं। लेकिन उनके भीतर आज भी वही दस साल का बच्चा ज़िंदा है, जो कभी लालटेन की रोशनी में शतरंज की चालें चला करता था।
कम साधनों में पढ़ाई के साथ शतरंज के प्रति जुनून ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया। यह कहानी देश के छोटे शहरों और गाँवों के उन बच्चों के लिए मिसाल है, जो अक्सर संसाधनों की कमी को अपना सबसे बड़ा बहाना बना लेते हैं।
दुर्गा तिवारी की दो बड़ी जीतें हैं—
गाँवों में रोशनी देने वाले विभाग में इंजीनियर के रूप में शासकीय सेवा।
गाँव के बुज़ुर्गों के खेल को देखकर शतरंज में महारथ हासिल करना।
यह कहानी सिखाती है कि
सीमित साधन सपनों को नहीं रोकते,
हौसला कमज़ोर पड़ता है तो मंज़िल दूर लगती है,
और जुनून अगर सच्चा हो, तो लालटेन की रोशनी भी रास्ता दिखा देती है।














