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आजादी के 77 साल बाद भी ‘अंतिम विदाई’ को तरसता फर्सवानी..खुले आसमान के नीचे सुलगती चिताएं..तालाब की मेढ़ पर भीगते शव देख छलका ग्रामीणों का दर्द..

सारंगढ़ : क्या आजादी के सात दशकों बाद भी एक इंसान को मरकर सुकून से पंचतत्व में विलीन होने का हक नहीं है? क्या विकास के खोखले नारों की हकीकत यही है कि अपनों के जाने के गम में डूबे परिवार को अंतिम संस्कार के लिए सिर छिपाने की जगह भी न मिले? फर्सवानी गांव से आती तस्वीरें किसी का भी कलेजा कपा देने के लिए काफी हैं, जहां आज भी बारिश के थपेड़ों के बीच, पन्नियों और तिरपाल की आड़ में अपनों की चिताओं को मुखाग्नि दी जा रही है।

भीगती चिताएं, टूटती सांसें-

जिस गांव में जिंदगी भर इंसान ने हाड़-तोड़ मेहनत की, वहां मौत के बाद उसे दो गज जमीन पर एक छत नसीब नहीं है। कहने को मुख्य बस्ती से 2 किलोमीटर दूर एक मुक्तिधाम का ढांचा खड़ा कर दिया गया है, लेकिन दुर्गम रास्ते और बेतुकी दूरी के कारण वहां तक शव ले जाना अपने आप में किसी सजाये-मौत से कम नहीं। लाचार होकर ग्रामीण आज भी गांव के तालाब की मेढ़ पर अपनों का दाह-संस्कार करने को मजबूर हैं। सोचिए, उस परिवार पर क्या बीतती होगी, जब अपनों को खोने के आंसू अभी सूखे भी नहीं होते और बारिश की बूंदें जलती चिता को बुझाने लगती हैं! यह सिर्फ एक शव का भीगना नहीं, बल्कि संवेदनशील प्रशासन और पंचायत व्यवस्था का पूरी तरह से बह जाना है।

अंधे-बहरे सिस्टम के खिलाफ भड़का जनाक्रोश-

ग्रामीणों ने वर्षों तक गुहार लगाई, अर्जियां दीं, लेकिन जिम्मेदारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। अब फर्सवानी का सब्र का बांध पूरी तरह टूट चुका है। गांव की गलियों में दुख से ज्यादा गुस्सा तैर रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर पंचायत और प्रशासन ने अपनी नींद से जागकर तत्काल सर्वसुविधायुक्त मुक्तिधाम का निर्माण शुरू नहीं कराया, तो वे सड़कों पर उतरने से नहीं हिचकेंगे।

कलेक्टोरेट कूच या घर-घर से चंदा?

खुद संवारेंगे अपनों का अंतिम सफर
लाचार और आक्रोशित ग्रामीणों ने अब सीधा अल्टीमेटम दे दिया है। सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण कलेक्टोरेट जाने का की तैयारी में हैं, ताकि अफसरशाही को उनकी नाकामी का अहसास कराया जा सके। वहीं, ग्रामीणों ने यह भी कसम खाई है कि अगर शासन-प्रशासन इतना लाचार और बेबस हो चुका है कि वह मुक्तिधाम भी नहीं बना सकता, तो वे खुद घर-घर जाकर झोली फैलाएंगे, एक-एक रुपया चंदा जुटाएंगे और अपनों की गरिमा की खातिर खुद मुक्तिधाम बनाएंगे। लेकिन अब इस अनदेखी और बेअदबी को और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा!

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