
सारंगढ़ । छग की धरती को पर्वों की धरती कहा जाता है, जहाँ हर त्योहार मिट्टी, कृषि और रिश्तों से जुड़ा होता है। ऐसा ही एक अनूठा और पवित्र पर्व भोजली है जो भाई-बहन के अटूट प्रेम व प्रकृति की समृद्धि का प्रतीक है। धार्मिक नगरी कोसीर में इस वर्ष भी भोजली पर्व को बड़ी हर्षोल्लास और पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया गया।सावन के महीने में रक्षा बंधन के एक दिन बाद मनाया जाने वाला यह पर्व छग की अस्मिता है । गांव की गलियों में आज सुबह से ही बाजे-गाजे, मांदर की थाप और बहनों के भोजली गीत गूंजते रहे।छग में भोजली पर्व की शुरुआत हरियाली अमावस्या के आस पास होती है। इस दिन किसान अपने खेत की उपजाऊ मिट्टी को एक छोटी टोकरी या मिट्टी के पात्र में लाते हैं, जिसे भोजली की टोकरी कहते हैं। उसमें गेहूं ,धान , जों, राई के दाने बोए जाते हैं। घर की महिलाएं और कुंवारी कन्याएं रोजाना सुबह नहा-धोकर इसमें पानी देती हैं और इसकी पूजा करती हैं। मान्यता है कि जैसे-जैसे भोजली के अंकुर बढ़ते हैं, वैसे-वैसे घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है। गेहूं के ये नन्हे अंकुर जीवन, उर्वरता और अन्न देवता का प्रतीक हैं। रक्षा बंधन के दूसरे दिन इन अंकुरों को ही भोजली कहा जाता है। बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और समृद्धि और भाई अपनी बहन को उसकी रक्षा का वचन देता है। यह केवल राखी से भी बड़ा पर्व माना जाता है, क्यों कि इसमें अन्न और मिट्टी की पूजा होती है।
पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाएं ढोल-मांदर की थाप पर लोकगीत गाते हुए निकलीं। सबसे पहले सभी गांव की ग्राम्य देवी, मां कौशलेश्वरी देवी मंदिर पहुंचे पूरा मंदिर परिसर भोजली देवी की जयकारे से गूंज उठा। सरपंच श्रीमती सुमन राव ने कहा कि भोजली हमारी मिट्टी का पर्व है, इसे सहेजना हमारी जिम्मेदारी है। पूजा के बाद बाजे-गाजे के साथ पूरा गांव बांधा तालाब पहुंचा, जिसे कोसीर की जीवनदायिनी कहा जाता है। इस दौरान गांव के गणमान्य नागरिक, बुजुर्ग, युवा और बड़ी संख्या में बच्चे उपस्थित रहे। सभी ने एक-दूसरे को भोजली देकर अभिवादन की बधाई दी। कोसीर में भोजली पर्व ने एक बार फिर साबित कर दिया कि छग की परंपराएं आज भी गांव की आत्मा में जीवित हैं। गांव की सरपंच सुमन राव उत्सवों को समृद्ध करने में लगी है उन की अच्छी पहल की सराहना गांव में हो रही है ।









