**सारंगढ़ पर दो-दो ‘संजय’ की नजर: दोनों संजय का ओहदा अहम और महत्वपूर्ण*दोनों संजय विकास की गंगा बहाने के लिये नही छोड़ रहे हैं कोई कसर**

सारंगढ़/बिलाईगढ — छत्तीसगढ़ के उभरते जिले सारंगढ़-बिलाईगढ़ की सियासत और प्रशासनिक गतिविधियों पर इन दिनों एक दिलचस्प समानता चर्चा में है—जिले की कमान दो ऐसे चेहरों के हाथ में है जिनका नाम भी एक है और जिनकी भूमिका भी बेहद अहम। एक तरफ जिला पंचायत अध्यक्ष संजय भूषण पांडेय , तो दूसरी ओर जिले के कलेक्टर संजय कन्नौजे । स्थानीय राजनीतिक गलियारों में इन्हें मज़ाक-मजाक में “सारंगढ़ के दो संजय” कहा जाने लगा है।
दरअसल यह तुलना भारतीय महाकाव्य महाभारत के उस पात्र संजय से की जा रही है, जिसे दिव्य दृष्टि प्राप्त थी और जो युद्धभूमि की हर गतिविधि देख सकता था। ठीक उसी तरह, जिले के इन दोनों संजय की नजर भी सारंगढ़ के विकास, सियासी हलचल और प्रशासनिक निर्णयों पर लगातार बनी हुई है।
*विकास और प्रशासन की दोहरी निगरानी*
सारंगढ़ जैसे नवगठित जिले में विकास की रफ्तार बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। जिला पंचायत के स्तर पर योजनाओं की दिशा तय करना और ग्रामीण क्षेत्रों तक संसाधनों का प्रवाह सुनिश्चित करना अध्यक्ष की जिम्मेदारी होती है। वहीं कलेक्टर प्रशासनिक मशीनरी को गति देने, योजनाओं को जमीन पर उतारने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
स्थानीय जानकारों का मानना है कि जब राजनीति और प्रशासन में तालमेल मजबूत होता है, तब जिले का विकास भी अपेक्षाकृत तेज दिखाई देता है। यही वजह है कि सारंगढ़ में इन दोनों पदों पर सक्रियता को लोग खास नजर से देख रहे हैं।
*चश्मा और “दिव्य दृष्टि” की दिलचस्प चर्चा*
सारंगढ़ की चर्चा में एक हल्का-फुल्का लेकिन रोचक पहलू भी जुड़ गया है।
महाभारत के संजय को दिव्य दृष्टि के लिए किसी चश्मे की जरूरत नहीं थी, लेकिन सारंगढ़ के दोनों संजय अपने व्यक्तित्व में चश्मे को खास पहचान की तरह रखते हैं। स्थानीय लोग मजाक में कहते हैं कि “जिले की हर गतिविधि इनकी नजर से बच नहीं पाती।” हालांकि इस प्रतीकात्मक तुलना के पीछे असली संदेश यह है कि जिले में होने वाले फैसलों, योजनाओं और राजनीतिक गतिविधियों पर दोनों की सक्रिय निगरानी बनी रहती है।
सियासत से लेकर योजनाओं तक
पिछले कुछ समय में जिले में कई ऐसे मुद्दे रहे हैं जिनमें ग्रामीण विकास योजनाओं की प्रगति, सड़क और आधारभूत ढांचे के काम, पंचायत स्तर पर बजट और योजनाओं की मॉनिटरिंग, और राजनीतिक गतिविधियों की हलचल ! इन सभी पर जिला पंचायत और जिला प्रशासन की साझा भूमिका दिखती है। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक इसे “संतुलित नेतृत्व” की स्थिति मानते हैं।
वस्तुतः इन्ही वजहों से सारंगढ़ में “दो संजय” की यह चर्चा सिर्फ नाम की समानता भर नहीं है, बल्कि यह उस समन्वय की कहानी भी है जिसमें राजनीति और प्रशासन मिलकर जिले की दिशा तय करते दिखाई देते हैं।
अगर यही तालमेल बना रहा, तो आने वाले समय में सारंगढ़ विकास और प्रशासनिक मॉडल के रूप में भी चर्चा में आ सकता है—और तब शायद यह उपमा सिर्फ रोचक नहीं, बल्कि सार्थक भी मानी जाएगी। बहरहाल दोनो संजय की दिब्य दृष्टि सारंगढ बिलाईगढ़ जिलै की विकास के लिये दौड़ रही है।














