छत्तीसगढ़सारंगढ़-बिलाईगढ़

*सती चरित्र से लेकर नरसिंह अवतार तक प्रसंगों ने किया भाव-विभोर*

सारंगढ़ । श्री गोपाल जी मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा के पावन प्रसंगों में कथा व्यास पीठ से महंत बंशीधर दास मिश्रा के द्वारा सती चरित्र , ध्रुव चरित्र, जड़़भरत, अजामिल एवं भक्त प्रहलाद नरसिंह अवतार की दिव्य कथाओं का भावपूर्ण वर्णन किया गया । भक्तों ने इन प्रसंगों को सुनकर अध्यात्म, भक्ति और जीवन के मूल सिद्धांतों का गहन संदेश आत्मसात किया । कलयुग में मोक्ष प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण है ।

व्यासपीठ से कथा की श्री गणेश महंत बंशीधर दास मिश्रा ने सती चरित्र से कियें । भगवान भोलेनाथ और राजा दक्ष प्रजापति के बीच अनबन के कारण माता सती ने अपने प्राण त्यागे , बाद में यह विवाद समाप्त हुआ ।जिसमें माता सती की भगवान शिव के प्रति अटूट निष्ठा और उनके आत्म सम्मान की रक्षा हेतु किए गए आत्मदाह के प्रसंग ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया ।

कथावाचक मिश्रा जी ने इसके बाद ध्रुव चरित्र में बालक ध्रुव की दृढ़ तपस्या और भगवान विष्णु की कृपा से ध्रुवलोक की प्राप्ति का प्रसंग प्रस्तुत किया । जिसने यह संदेश दिया कि – सच्चे संकल्प और भक्ति से ईश्वर प्राप्ति संभव है । भक्तों के लिए भगवान तुम दास कहाते हो कहकर भक्त व भगवान के संबंधों को बताया गया । जड़भरत कथा के माध्यम से जीवन में वैराग्य और आत्म साक्षात्कार का संदेश दिया । जड़भरत के निष्काम कर्म और संसारिक मोह से विमुक्ति का प्रसंग आत्म चिंतन का कारण बना । इसके पश्चात अजामिल चरित्र का वर्णन हुआ, जिस में एक पतित व्यक्ति का अंतिम समय में नारायण नाम उच्चारण करने से उद्धार होने का प्रसंग भक्ति और नाम स्मरण की महिमा का परिचायक बना । महंत ने बताया कि -रामचरितमानस में बाबा तुलसीदास ने कहा है कि – एक घड़ी आधो घड़ी आधों से पुनी आध , तुलसी चर्चा राम के कटे कोटि अपराध । राम नाम है एक आधार कह कर भागवतचार्य ने भक्ति की महिमा का गुण गान कियें ।

अंत में प्रहलाद चरित्र और नरसिंह अवतार के दिव्य प्रसंग का वर्णन हुआ । भक्त शिरोमणि भगवान विष्णु ने भक्त प्रहलाद की रक्षा हेतु खंभे से प्रकट होकर असुर हिरण्य कश्यप का वध किया । इस प्रसंग ने यह संदेश दिया कि – सच्चे भक्त की रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं और अधर्म का अंत निश्चित होता है। रामचरितमानस का उदाहरण देते हुए भागवताचार्य ने कहा कि – जब-जब हो हीं धर्म के हानि बाढ़ही असुर, अधम , अभिमानी । तब तब धरी प्रभु मनुज शरीरा , हरहीं कृपा निधि सज्जन पीरा । कथा के दौरान भक्तजन भक्ति भाव में सराबोर होकर जय श्री हरि , नरसिंह भगवान की जय के जयघोष करते रहे । जो भी व्यक्ति भागवत कथा का एक प्रसंग भी श्रवण करता है उसे संपूर्ण कथा का फल प्राप्त होता है । बंशीधर दास मिश्रा ने कहा कि – वक्ता से बड़ा श्रोता होता है , क्योंकि वक्ता तो पढ़कर बोलता है पर श्रोता जब ध्यान पूर्वक सुन कर उस पर अमल करता है तभी कथा का सच्चा लाभ मिलता है । कथा स्थल का वातावरण भक्तिरस और आस्था से परिपूर्ण बना रहा ।

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